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कभी नेनुँआ टाटी पे चढ़ के रसोई के दो महीने का इंतज़ाम कर देता था। कभी खपरैल की छत पे चढ़ी लौकी महीना भर निकाल देती थी, कभी बैसाख में दाल और भतुआ से बनाई सूखी कोहड़ौरी, सावन भादो की सब्जी का खर्चा निकाल देती थी‌! वो दिन थे, जब सब्जी पे खर्चा पता तक नहीं चलता था। देशी टमाटर और मूली जाड़े के सीजन में भौकाल के साथ आते थे,लेकिन खिचड़ी आते-आते उनकी इज्जत घर जमाई जैसी हो जाती थी! तब जीडीपी का अंकगणितीय करिश्मा नहीं था। ये सब्जियाँ सर्वसुलभ और हर रसोई का हिस्सा थीं। लोहे की कढ़ाई में, किसी के घर रसेदार सब्जी पके तो, गाँव के डीह बाबा तक गमक जाती थी। धुंआ एक घर से निकला की नहीं, तो आग के लिए लोग चिपरि लेके दौड़ पड़ते थे संझा को रेडियो पे चौपाल और आकाशवाणी के सुलझे हुए समाचारों से दिन रुखसत लेता था! रातें बड़ी होती थीं, दुआर पे कोई पुरनिया आल्हा छेड़ देता था तो मानों कोई सिनेमा चल गया हो। किसान लोगो में कर्ज का फैशन नहीं था, फिर बच्चे बड़े होने लगे, बच्चियाँ भी बड़ी होने लगीं! बच्चे सरकारी नौकरी पाते ही,अंग्रेजी इत्र लगाने लगे। बच्चियों के पापा सरकारी दामाद में नारायण का रूप देखने लगे, किसान क्रेड...

गोरा-बादल

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#गोरा_बादल : वीरता और शौर्य की अद्भुत कहानी , जिन्होंने अपनी वीरता से खिलजी को उसकी ओकात दिखाई थी ----------------------------------------------------------------- गौरा और बादल ऐसे ही दो शूरवीरों के नाम है, जिनके पराक्रम से राजस्थान की मिट्टी बलिदानी है . जीवन परिचय और इतिहास : गौरा ओर बदल दोनों चाचा भतीजे जालोर के चौहान वंश से सम्बन्ध रखते थे | मेवाड़ की धरती की गौरवगाथा गोरा और बादल जैसे वीरों के नाम के बिना अधूरी है. हममें से बहुत से लोग होंगे, जिन्होंने इन शूरवीरों का नाम तक न सुना होगा ! मगर मेवाड़ की माटी में आज भी इनके रक्त की लालिमा झलकती है. मुहणोत नैणसी के प्रसिद्ध काव्य ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ में इन दो वीरों के बारे पुख्ता जानकारी मिलती है. इस काव्य की मानें तो रिश्ते में चाचा और भतीजा लगने वाले ये दो वीर जालौर के चौहान वंश से संबंध रखते थे, जो रानी पद्मिनी की विवाह के बाद चितौड़ के राजा रतन सिंह के राज्य का हिस्सा बन गए थे। ये दोनों इतने पराक्रमी थे कि दुश्मन उनके नाम से ही कांपते थे. कहा जाता है कि एक तरफ जहां चाचा गोरा दुश्मनों के लिए काल के सामान थे, वहीं द...

सनातन(हिन्दू) नव वर्ष

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*◆ नववर्ष तिथि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का महत्त्व* नव वर्ष 2079, "नल" नाम सम्वत्सर, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, 2 अप्रैल 2022 से प्रारम्भ हो रहा है, इसका महत्त्व जानना हम सभी के लिए आवश्यक है... चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पहली तिथि, बढ़ते हुए चन्द्र के साथ नए वर्ष का आगमन। 1 अरब 95 करोड़ 58 लाख 85 हज़ार 123 वर्ष पहले चैत्र मास के शुक्लपक्ष में सूर्योदय के समय ब्रह्माजी ने जगत की रचना की थी।१ आरम्भ है सृष्टि का यह पावन प्रतिपदा। महाराज इक्ष्वाकु का राज्यारोहण है यह प्रतिपदा। सतयुग व प्रभव आदि 60 संवत्सरों का आरम्भ है चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा।२ चन्द्रमा और सूर्य के वर्ष का आरम्भ है मधुमास की धवल प्रतिपदा।३ इस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सूर्योदय में जो वार होता है उसी का अधीश वर्ष का राजा होता है।४ लंका नगरी में मधुमास (चैत्र) के सितपक्ष के आरम्भ होने पर सूर्योदय के समय जब रविवार था तब दिन, मास, पर्व, युगादि व युगपत आदि की प्रवृत्ति हुई थी।५ सम्राट विक्रमादित्य का शासनग्रहणदिवस है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा। 180 देशों के अधीश्वर शकारि सम्राट विक्रमादित्य जिन्होंन...