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तितली का संघर्ष!!!

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एक बार एक आदमी को अपने बगीचे में टहलते हुए किसी टहनी से लटकता हुआ एक तितली का कोकून दिखाई पड़ा| अब हर रोज़ वो आदमी उसे देखने लगा , और एक दिन उसने गौर किया कि उस कोकून में एक छोटा सा छेद बन गया है| उस दिन वो वहीँ बैठ गया और घंटो उसे देखता रहा| उसने देखा की तितली उस खोल से बाहर निकलने की बहुत कोशिश कर रही है , पर बहुत देर तक प्रयास करने के बाद भी वो उस छेद से नहीं निकल पायी, और फिर वो बिलकुल शांत हो गयी मानो उसने हार मान ली हो| इसलिए उस आदमी ने निश्चय किया कि वो उस तितली की मदद करेगा| उसने एक कैंची उठायी और कोकून की opening को इतना बड़ा कर दिया की वो तितली आसानी से बाहर निकल सके, और यही हुआ| तितली बिना किसी और संघर्ष के आसानी से बाहर निकल आई, पर उसका शरीर सूजा हुआ था, और पंख सूखे हुए थे| वो आदमी तितली को ये सोच कर देखता रहा कि वो किसी भी वक़्त अपने पंख फैला कर उड़ने लगेगी, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ| इसके उलट बेचारी तितली कभी उड़ ही नहीं पाई और उसे अपनी बाकी की ज़िन्दगी इधर-उधर घिसटते हुए बीतानी पड़ी| वो आदमी अपनी दया और जल्दबाजी में ये नहीं समझ पाया की दरअसल कोकून से निकलने की प...

आज ही क्यो नही?

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एक बार की बात है कि एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर-सम्मान किया करता था |गुरु भी अपने इस शिष्य से बहुत स्नेह करते थे लेकिन वह शिष्य अपने अध्ययन के प्रति आलसी और स्वभाव से दीर्घसूत्री था | सदा स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश करता तथा आज के काम को कल के लिए छोड़ दिया करता था | अब गुरूजी कुछ चिंतित रहने लगे कि कहीं उनका यह शिष्य जीवन-संग्राम में पराजित न हो जाये| आलस्य में व्यक्ति को अकर्मण्य बनाने की पूरी सामर्थ्य होती है | ऐसा व्यक्ति बिना परिश्रम के ही फलोपभोग की कामना करता है| वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है, तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाता| यहाँ तक कि अपने पर्यावरण के प्रति भी सजग नहीं रहता है और न भाग्य द्वारा प्रदत्त सुअवसरों का लाभ उठाने की कला में ही प्रवीण हो पता है | उन्होंने मन ही मन अपने शिष्य के कल्याण के लिए एक योजना बना ली | एक दिन एक काले पत्थर का एक टुकड़ा उसके हाथ में देते हुए गुरु जी ने कहा –‘मैं तुम्हें यह जादुई पत्थर का टुकड़ा, दो दिन के लिए दे कर, कहीं दूसरे गाँव जा रहा हूँ| जिस भी लोहे की वस्तु को तुम इससे स्पर्श करोगे| वह स्वर्ण में पर...

घमंडी कौआ

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हंसों का एक झुण्ड समुद्र तट के ऊपर से गुज़र रहा था, उसी जगह एक कौवा भी मौज मस्ती कर रहा था। उसने हंसों को उपेक्षा भरी नज़रों से देखा “तुम लोग कितनी अच्छी उड़ान भर लेते हो !” कौवा मज़ाक के लहजे में बोला, “तुम लोग और कर ही क्या सकते हो बस अपना पंख फड़फड़ा कर उड़ान भर सकते हो !!! क्या तुम मेरी तरह फूर्ती से उड़ सकते हो ??? मेरी तरह हवा में कलाबाजियां दिखा सकते हो ??? नहीं, तुम तो ठीक से जानते भी नहीं कि उड़ना किसे कहते हैं ! कौवे की बात सुनकर एक वृद्ध हंस बोला,” ये अच्छी बात है कि तुम ये सब कर लेते हो, लेकिन तुम्हे इस बात पर घमंड नहीं करना चाहिए।” ”मैं घमंड – वमंड नहीं जानता, अगर तुम में से कोई भी मेरा मुकाबला कर सकत है तो सामने आये और मुझे हरा कर दिखाए।” एक युवा नर हंस ने कौवे की चुनौती स्वीकार कर ली। यह तय हुआ कि प्रतियोगिता दो चरणों में होगी, पहले चरण में कौवा अपने करतब दिखायेगा और हंस को भी वही करके दिखाना होगा और दूसरे चरण में कौवे को हंस के करतब दोहराने होंगे। प्रतियोगिता शुरू हुई, पहले चरण की शुरुआत कौवे ने की और एक से बढ़कर एक कलाबजिया दिखाने लगा, वह कभी गोल-गोल चक्कर ...

मै ऐसा क्यो हूँ???

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पट्टू तोता बड़ा उदास बैठा था . माँ ने पुछा , ” क्या हुआ बेटा तुम इतने उदास क्यों हो ?” ” मैं अपनी इस अटपटी चोंच से नफरत करता हूँ !!”, पट्टू लगभग रोते हुए बोला . “तुम अपनी चोंच से नफरत क्यों करते हो ?? इतनी सुन्दर तो है !”, माँ ने समझाने की कोशिश की . “नहीं , बाकी सभी पक्षियों की चोंच कहीं अच्छी है …. बिरजू बाज , कालू कौवा , कल्कि कोयल … सभी की चोंच मुझसे अच्छी है…. पर मैं ऐसा क्यों हूँ ?”, पट्टू उदास बैठ गया . माँ कुछ देर शांति से बैठ गयी , उसे भी लगा कि शायद पट्टू सही कह रहा है , पट्टू को समझाएं तो कैसे …। तभी उसे सूझा कि क्यों ना पट्टू को ज्ञानी काका के पास भेजा जाए , जो पूरे जंगल में सबसे समझदार तोते के रूप में जाने जाते थे  माँ ने तुरंत ही पट्टू को काका के पास भेज दिया . ज्ञानी काका जंगल के बीचो -बीच एक बहुत पुराने पेड़ की शाखा पर रहते थे। पट्टू उनके समक्ष जाकर बैठ गया और पुछा , ” काका , मेरी एक समस्या है !” “प्यारे बच्चे तुम्हे क्या दिक्कत है , बताओ मुझे “, काका बोले . पट्टू बताने लगा ,” मुझे मेरी चोंच पसंद नहीं है , ये कितनी अटपटी सी लगती है। ….. बिलकुल भी अच्छी नही...

"बोले हुए शब्द वापस नहीं आते"

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हमारे दिन प्रतिदिन के जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हम या तो बहुत गुस्से में झुंझलाकर या बस यूँ ही कुछ ऐसा कह जाते हैं जो हमें नहीं कहना चाहिए| आज मैं आपके साथ एक छोटी सी कहानी Share कर रहा हूँ जो मैंने मार्गदर्शन में पढ़ा था| इसे ध्यान से पढ़िए और इससे मिलने वाली सीख को गाँठ बाँध लीजिये| एक बार एक किसान ने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह एक संत के पास गया| उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा| संत ने किसान से कहा , ”तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर लो और उन्हें शहर के बीचो-बीच जाकर रख दो |” किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया| तब संत ने कहा , ”अब जाओ और उन पंखों को इकठ्ठा कर के वापस ले आओ|” किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे, और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा| तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है| तुम आसानी से इन्हें अपने मुख से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते| इस कहानी से क्या सीख मिलती है :- कुछ कड़वा बोलने से पहले ये याद रखें ...