यादें (नज्म)
'यादें' नज्म
कमख़ाब से बदन वो वो रेशमी अदायें
सोज़े दुरुं से जालना दाग़ों का धायें धायें
उठते हैं और शोले फूकों से जो बुझायें
कैसा था वो ज़माना कैसे तुम्हें बतायें
परदे पड़े हुए है यादों की खिड़कियों पर
क़ुर्बान जानो दिल से उन भोली लड़कियों पर
मेंहदी के चोर जकड़े उन गोरी मुट्ठियों में
सोने का एक क़लम था चाँदी की उँगलियों में
लिक्खे थे ख़त जो उसने गर्मी की छुट्टियों में
रखते हैं गर्म दिल को शिद्दत की सर्दियों में
महका हुआ शगूफा जैसे किसी चमन का
क्या ज़ायक़ा बतायें उस बेसनी बदन का
साग़र किसे सुनायें वो इश्क़ का फ़साना
आहट ज़रा सी पाना कोठे पे दौड़ आना
उट्ठा कुछ इस तरह फ़िर दोनों का आबो दाना
अब ग़ैर का नशेमन उसका है आशियाना
कब ख़ैरियत से गुज़रे दिन अपनी आशिक़ी के
अम्मी हैं वो किसी की अब्बु हैं हम किसी के
पिंडली वो गोरी गोरी पायल वो सादी सादी
हम से मोहब्बतें कीं और की किसी से शादी
दोनों की क़िस्मतों में लिक्खी थी नामुरादी
रानी है वो किसी की इस दिल की शाहज़ादी
रस्ते मोहब्बतों के काटे हैं बिल्लियों ने
हम जैसे कितने अब्बु मारे हैं अम्मियों ने
अब भी है याद दिल को वो इश्क़ का ज़माना
वो चाँद सी हथेली वो पान का बनाना
चुना कभी लगाना कत्था कभी लगाना
चुटकी से फ़िर पकड़ कर मेरी तरफ बढ़ाना
उस पान का न उतरा सर से जूनून अब तक
खायी थी इक गिलौरी थूका है खून अब तक
झूटा हुआ है जब से ये इश्क़ का फसाना
मेहबूब भी सिड़ी है आशिक़ भी है दीवाना
दोनों बना रहे हैं पानी पे आशियाना
थम्स उप की बोतलों का आया है क्या ज़माना
देखो वफा की रस्में कैसे मिटा रहे हैं
एक दुसरे को बैठे ठेंगा दिखा रहे हैं
होटों पे मुस्कुराहट आँखें बुझी बुझी हैं
बिजली गिरी है दिल पर वो जब कहीं मिली हैं
हम कौन से हैं ज़िंदा वो भी तो मर चुकी हैं
हम भी हैं अब नमाज़ी और वो भी मुत्तक़ी हैं
पहलू में रख के तकिये बिरह की रात खुश हैं
हम दोनों अपने अपने बच्चों के साथ खुश हैं
साग़र ख़य्यामी
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