बिना श्रृंगार नारी अधूरी
लोग कहते है कि...
औरते बहुत श्रृंगार करती हैं...
सच ही तो है...
औरतें सिर्फ चेहरे पर ही नही..
बल्कि घर ,परिवार ,बच्चे, पति ,समाज सभी की
कमियों पर हमेशा श्रृंगार ही करती रहती हैं...
दोस्तो की गलतियों पर श्रृंगार ...
बेहतर शिक्षा न् मिलने पर माता - पिता पर श्रृंगार ...
शादी होने पर ससुराल वालों के तानो पर श्रृंगार..
मायके की कमियों पर श्रृंगार ...
पति की बेवफाई पर श्रृंगार ...
रिश्तों की बदनीयती पर श्रृंगार ...
बच्चों की कमियो पर मेकअप और उनकी गलतियों पर श्रृंगार ...
बुढ़ापे में दामाद के द्वारा किया गए अनादर पर श्रृंगार ...
बहू की बेरुखी पर श्रृंगार ...
और आखिर में...
बुढ़ापे में परिवार में अस्तित्वहीन होने पर श्रृंगार ...
एक औरत जन्म से लेकर मृत्यु तक मेकअप ही तो करती रहती है...
सिर्फ एक ही आस में कि उसके प्रयास से सभी आपस
में प्यार से बंधे रहे
तभी तो कहते हैं बिना श्रृंगार अधूरी नारी...
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